हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, आयतुल्लाहिल उज़्मा जवादी आमोली का साप्ताहिक नैतिकता का पाठ पिछले दिन क़ुम मुक़द्दस की मस्जिद-ए-आज़म में विभिन्न वर्गों के लोगों की उपस्थिति में आयोजित हुआ।
इस बैठक में उन्होंने हज़रत ज़ैनब कुबरा (स.) की विलादत के मुबारक अवसर पर अहले बैत (अ) के शैक्षणिक और आध्यात्मिक मक़ाम को स्पष्ट किया। साथ ही उबैदुल्लाह इब्ने ज़ियाद के सामने हज़रत ज़ैनब (स.) द्वारा कहे गए शब्दों का विश्लेषण करते हुए जबरवादी विचारधारा के मुकाबले में आपके किरदार और इंसान की ज़िम्मेदारी के विषय पर विस्तार से चर्चा की।
उन्होंने कहा कि कूफ़ा में हज़रत ज़ैनब कुबरा (स.) का ख़िताब केवल रोने और मुसीबतों का बयान नहीं था, बल्कि उसमें एक गहरे और सूक्ष्म अक़ीदती तथा कलामी मसले की ओर संकेत किया गया था। मुआविया ने अपने लंबे शासनकाल में सत्ता को मज़बूत करने और सरकार को जारी रखने के लिए सिद्धांत-ए-जबर को बढ़ावा दिया, ताकि अच्छे कामों और बरकतों का श्रेय हुकूमत को दिया जाए और बुराइयों को अल्लाह की ओर मंसूब किया जाए।
उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि बनी उमय्या और उनके बाद बनी अब्बास तथा दूसरे शासक अपने अत्याचारों को जायज़ ठहराने और अपनी सत्ता की रक्षा करने के लिए घटनाओं को अल्लाह की क़ज़ा व क़दर से जोड़ते थे, ताकि वे अपने कामों की ज़िम्मेदारी से खुद को बरी दिखा सकें। इसके विपरीत, अहले बैत (अ) ने “ला जब्र वला तफ़वीज़, वलाकिन अम्रुन बैनल अम्रैन” अर्थात न तो इंसान पूरी तरह विवश है और न ही उसे पूरी तरह स्वतंत्र छोड़ दिया गया है, बल्कि इन दोनों के बीच एक स्थिति है—की वास्तविकता बयान करते हुए इंसान को अपने कर्मों और आचरण का ज़िम्मेदार ठहराया।
उन्होंने कहा कि इमाम (अ) ज्ञान और पहचान की ऊंचाइयों पर पहुंचकर सूक्ष्म शैक्षणिक तथा बौद्धिक मसलों को स्पष्ट करते थे और वैचारिक तथा अक़ीदती विचलनों के सामने डटकर खड़े होते थे।
आयतुल्लाह जवादी आमोली ने हज़रत ज़ैनब (स.) और उबैदुल्लाह इब्ने ज़ियाद के बीच हुई बातचीत का उल्लेख करते हुए कहा कि जब इब्ने ज़ियाद ने हज़रत ज़ैनब (स.) से पूछा कि तुमने देखा कि अल्लाह ने तुम्हारे भाई के साथ क्या किया, तो यहां बात मेरी, हमारी या बनी उमय्या की नहीं थी, बल्कि जबरवादी विचारधारा को अल्लाह के नाम से पेश किया जा रहा था।
हज़रत ज़ैनब (स.) ने जवाब दिया, “मा रअयतु इल्ला जमीला” अर्थात “मैंने सुंदरता के सिवा कुछ नहीं देखा।” इसका अर्थ यह था कि अल्लाह का काम सुंदर है, लेकिन हत्या करने वाले तुम हो। अली इब्ने हुसैन (अ) को शहीद करने वाले तुम हो। इस तरह आपने उमय्या की जबरवादी विचारधारा को चुनौती दी और इंसान के इख्तियार तथा अपने कर्मों के प्रति उसकी ज़िम्मेदारी की वास्तविकता स्पष्ट की।
उन्होंने आगे कहा कि अमीरुल मोमिनीन इमाम अली (अ) ने नहजुल बलाग़ा में फ़रमाया है:
“अला हुर्रुन यदअु हाज़िहिल लुमाज़ता लि-अह्लिहा, इन्नहू लैसा लि-अनफुसिकुम समनुन इल्लल जन्नह, फ़ला तबिऊहा इल्ला बिहा।”
अर्थात, “क्या कोई स्वतंत्र इंसान नहीं है, जो भोजन के इस बचे हुए टुकड़े को उसके योग्य लोगों के लिए छोड़ दे? जान लो कि तुम्हारे अस्तित्व की कीमत जन्नत के अलावा कुछ नहीं है। इसलिए इसे जन्नत के अलावा किसी दूसरी चीज़ के बदले मत बेचो।”
उन्होंने ‘लुमाज़ा’ शब्द की व्याख्या करते हुए कहा कि इसका अर्थ दांतों के बीच बचा हुआ भोजन है। बहुत से पद और ओहदे, चाहे वे धार्मिक शिक्षण संस्थानों से संबंधित हों या अंतरराष्ट्रीय स्तर के, राजनीतिक हों या सामाजिक, ये सभी लुमाज़ा की तरह हैं। स्वतंत्र इंसान वह है, जो खुद को इन चीज़ों में उलझाकर न रखे और अपने अस्तित्व की वास्तविक कीमत पहचाने। इंसान की असली कीमत जन्नत है, इसलिए उसे इससे कम कीमत पर खुद को नहीं बेचना चाहिए।
आयतुल्लाह जवादी आमोली ने अमीरुल मोमिनीन (अ) के इस कथन “अल-क़ल्बु मुस्हफ़ुल बस़र” का हवाला देते हुए कहा कि इंसान को अपने दिल की किताब का अध्ययन करना चाहिए और यह देखना चाहिए कि उसका दिल उससे क्या चाहता है। दिल में यह क्षमता है कि वह अपने पालनहार से मुनाजात करे और अल्लाह की याद के माध्यम से आध्यात्मिक दूरी तय करे।
उन्होंने अपने भाषण के अंतिम भाग में रूह की वास्तविकता की ओर संकेत करते हुए कहा कि इस्लाम में पुरुष और महिला होना इंसान के शारीरिक पहलू से संबंधित है, जबकि रूह न पुरुष है और न महिला। शरीर, रूह की उड़ान के लिए सीढ़ी की तरह है। ऐसा नहीं है कि शारीरिक विशेषताएं रूह की वास्तविकता को निर्धारित करती हैं। रूह कमाल और तजर्रुद की राह पर आगे बढ़ती है। इसी दृष्टि से इंसान की वास्तविकता को केवल पुरुष या महिला होने तक सीमित नहीं किया जा सकता।
अंत में उन्होंने उपस्थित लोगों और शैक्षणिक शोध के मार्ग पर चलने वाले सभी व्यक्तियों के लिए दुआ की। उन्होंने उम्मीद जताई कि सभी लोग हज़रत ज़ैनब कुबरा (स.) की दुआओं के पात्र बनें, इस्लामी व्यवस्था अहले बैत (अ) की कृपा की छाया में ख़तरों से सुरक्षित रहे और सभी को हज़रत वली-ए-अस्र (अज्जलल्लाहु तआला फ़रजहुश शरीफ़) की सेवा में उपस्थित होने का सौभाग्य प्राप्त हो।
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